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फार्मास्युटिकल पेटेंट की संख्या पिछले एक दशक में चार गुना से अधिक बढ़ी, इनोवेशन-आधारित रिसर्च मॉडल की ओर तेजी से बढ़े

Updated on Wednesday, July 15, 2026 16:25 PM IST

भारत में विकसित फार्मास्युटिकल पेटेंट फैमिली की संख्या पिछले एक दशक में चार गुना से अधिक बढ़ गई है। साथ ही, देश की दवा खोज की पाइपलाइन 195 कंपनियों में 1,095 से अधिक हो गई है। यह जानकारी बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई। यह दिखाता है कि भारत जेनेरिक दवाओं के उत्पादन आधारित मॉडल से इनोवेशन-आधारित रिसर्च मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) और हेल्थकोइस की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया कि भारत ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है जहां अगले पांच वर्ष तय करेंगे कि वह अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा, लागत प्रतिस्पर्धा और डेटा की ताकत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी लाइफ साइंसेज इनोवेशन इकोसिस्टम में बदल पाता है या नहीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में विकसित फार्मा पेटेंट फैमिली की संख्या 2015 में लगभग 716 से बढ़कर 2024 में 2,995 हो गई, जो चार गुना से अधिक की वृद्धि है। वहीं, वित्त वर्ष 2026 में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल निवेश दोगुने से अधिक बढ़कर 731 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इसी अवधि में देश में बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या लगभग 1,500 से बढ़कर 2,400 हो गई। वैश्विक फार्मा पेटेंट में भारत की हिस्सेदारी 3-4 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 10 प्रतिशत हो गई है, जो केवल संख्या में ही नहीं बल्कि गुणवत्ता के स्तर पर भी महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती है। रिपोर्ट में आगे बताया गया कि पिछले एक दशक में भारत ने 10 से अधिक नई दवा परिसंपत्तियां विकसित की हैं। भारतीय कंपनियां अब केवल जेनेरिक और बायोसिमिलर दवाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक बाजारों के लिए इनोवेटिव दवाओं के विकास, लाइसेंसिंग और व्यावसायीकरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट ने इस तेजी के पीछे चार प्रमुख कारण बताए हैं। इनमें शुरुआती और ट्रांसलेशनल रिसर्च के लिए सरकार की ओर से लगभग 5 अरब डॉलर की फंडिंग, शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग, नियामकीय सुधारों के कारण दवा विकास की समयसीमा का 180-270 दिनों से घटकर 60-120 दिन होना तथा जीनोम वैली और सी-कैंप जैसी साझा अनुसंधान एवं विनिर्माण अवसंरचना शामिल हैं।

रिपोर्ट में शुरुआती सफलताओं का भी जिक्र किया गया है। इनमें बीआईआरएसए 101, भारत की पहली स्वदेशी सीआरआईएसपीआर-आधारित थेरेपी, एवं एनईएक्ससीएआर 19, एक स्वदेशी सीएआर-टी थेरेपी शामिल हैं। एनईएक्ससीएआर 19 की कीमत विदेशों में उपलब्ध समान उपचारों की तुलना में लगभग दसवें हिस्से के बराबर है। बीसीजी इंडिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीनियर पार्टनर प्रियंका अग्रवाल ने कहा, “भारत की नवाचार यात्रा अब वास्तविक गति पकड़ चुकी है और एक स्थायी नवाचार इंजन के रूप में उसका विकास तेजी से आगे बढ़ रहा है।”

हेल्थकोइस के सह-संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर चार्ल्स जानसेन ने कहा, “हम देख रहे हैं कि भारत में विकसित वैज्ञानिक शोध को वैश्विक फार्मा कंपनियां लाइसेंस दे रही हैं और स्वदेशी सीएआर-टी थेरेपी वैश्विक लागत की तुलना में बेहद कम कीमत पर मरीजों का इलाज कर रही हैं। ऐसे निवेश की आवश्यकता है जो विज्ञान को समझे और शुरुआती अनिश्चित वर्षों में उसका साथ दे। यही कुछ चुनिंदा सफलताओं और एक मजबूत, टिकाऊ नवाचार इंजन के बीच अंतर पैदा करेगा।”

 

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