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मनोरंजन

आखिरी सवाल: साहसी सिनेमा की दमदार मिसाल, बेधड़क सवालों से झकझोरती फिल्म

Updated on Friday, May 15, 2026 16:11 PM IST

मुंबई : कुछ फिल्में सिर्फ मनोरंजन करती हैं, कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं, और फिर कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो तूफान की तरह आती हैं और पूरे देश को उन सवालों के सामने खड़ा कर देती हैं, जिनसे दशकों से बचने की कोशिश की जाती रही है। अभिजीत मोहन वरंग द्वारा निर्देशित और निखिल नंदा द्वारा निर्मित ‘आखिरी सवाल’ ऐसी ही एक दमदार राजनीतिक ड्रामा फिल्म है। यह फिल्म दर्शकों को सहज महसूस कराने के लिए नहीं बनी, बल्कि उन्हें चुनौती देने, झकझोरने और क्रेडिट रोल खत्म होने के बाद भी सोचने पर मजबूर करने के लिए बनाई गई है।

ऐसे समय में जब मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर सुरक्षित रास्ता चुनता है, ‘आखिरी सवाल’ ने साहस का रास्ता चुना है। फिल्म देश के कुछ सबसे विवादित और भावनात्मक मुद्दों को खुलकर छूती है- बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर महात्मा गांधी की हत्या तक और उन सवालों को उठाती है जिन पर पीढ़ियों से बहस होती रही है, लेकिन जिनके जवाब कभी पूरी तरह सामने नहीं आए।

फिल्म की सबसे चौंकाने वाली बात इसकी बेबाक ईमानदारी है, जिसके साथ इन मुद्दों को प्रस्तुत किया गया है। कहानी यह सवाल उठाने की हिम्मत करती है कि क्या आरएसएस जैसी संस्थाओं की इन ऐतिहासिक घटनाओं में गहरी भूमिका रही थी, और जिस तरह फिल्म अपने नजरिए और तथ्यों को सामने रखती है, वह दर्शकों को स्तब्ध कर देता है। कई ऐसे पल आते हैं जब लेखन की निर्भीकता सचमुच आपको हैरान कर देती है।

संजय दत्त ने अपने करियर के सबसे तीव्र और प्रभावशाली अभिनय में से एक दिया है। यह वह बड़े-से-बड़ा किरदार निभाने वाले संजय दत्त नहीं हैं, जिन्हें दर्शक देखने के आदी हैं। यहां वह एक संयमित, घायल और निडर कलाकार के रूप में नजर आते हैं, जिसकी आंखों में इतिहास, गुस्सा और सच्चाई का बोझ दिखाई देता है। उनका हर संवाद असर छोड़ता है और हर खामोशी उससे भी ज्यादा बोलती हुई महसूस होती है। उनका अभिनय फिल्म को सिर्फ राजनीतिक रूप से प्रासंगिक नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से अविस्मरणीय बना देता है।

हालांकि फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज पैकेज नमाशी चक्रवर्ती हैं। वह साबित करते हैं कि वह दर्शकों की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा प्रतिभाशाली हैं। उनकी ईमानदारी, भावनात्मक गहराई और स्क्रीन प्रेजेंस कहानी में एक अलग ऊर्जा जोड़ती है। उनके कई दृश्य लंबे समय तक दर्शकों के मन में बने रहते हैं और यह दिखाते हैं कि वह बड़े स्तर की पहचान पाने के लिए पूरी तरह तैयार अभिनेता हैं।

‘आखिरी सवाल’ की सबसे बड़ी ताकत इसके न्यूजरूम डिबेट वाले दृश्य हैं। इन हिस्सों को बेहद तीव्रता और बुद्धिमत्ता के साथ लिखा गया है, जो लगातार दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखते हैं। ये टकराव इतने वास्तविक लगते हैं मानो पर्दे पर पूरा देश खुद से बहस कर रहा हो। कुछ दृश्य इतने भावनात्मक और बेचैन कर देने वाले हैं कि वे सचमुच आत्मा को झकझोर देते हैं।

दृश्यात्मक रूप से भी फिल्म लगातार तनाव बनाए रखती है। हर फ्रेम का अपना महत्व और उद्देश्य है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। राजनीतिक और ऐतिहासिक परतों से भरे विषयों के बावजूद कहानी अपनी पकड़ नहीं खोती। उपदेशात्मक बनने के बजाय फिल्म भावनात्मक रूप से जुड़ी रहती है और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से छूती है।

सहायक कलाकारों में अमित साध, समीरा रेड्डी, नीतू चंद्रा और त्रिधा चौधरी ने भी अपने करियर के कुछ सबसे प्रभावशाली अभिनय दिए हैं, जो फिल्म की भावनात्मक रूप से भारी कहानी को और मजबूती प्रदान करते हैं। वहीं निर्माता निखिल नंदा ऐसे निडर और समझौता न करने वाले विषय को समर्थन देने के लिए विशेष प्रशंसा के पात्र हैं।

‘आखिरी सवाल’ सिर्फ एक फिल्म नहीं लगती, बल्कि ऐसा संवाद महसूस होता है, जिसे भारत शायद कभी खुलकर करने के लिए तैयार नहीं था। साहसी, बेचैन करने वाली, भावनात्मक और निर्मम ईमानदारी से भरी यह फिल्म वह करने में सफल होती है, जो बहुत कम राजनीतिक ड्रामा कर पाते हैं- यह दर्शकों को असहज भी करती है और पूरी तरह बांधे भी रखती है।

यह अपने सबसे शुद्ध रूप में साहसी सिनेमा है।

 

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