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पंजाब

सुनने की क्षमता बहाल करने से लेकर जिंदगियाँ बचाने तक: समय पर ईएनटी इलाज अब पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण एवं कारगर

Updated on Monday, July 06, 2026 18:53 PM IST

चंडीगढ़ : ई.एन.टी. (कान, नाक और गले) के विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार कान के संक्रमण के कारण अच्छी तरह से सुन न पाने वाला बच्चा, वर्षों से नाक से साँस लेने में असमर्थ व्यक्ति या तम्बाकू के उपयोग के कारण लंबे समय तक मुँह के अल्सर को नज़रअंदाज़ करने वाला व्यक्ति — ये ऐसी आम समस्याएँ हैं जिनमें मरीज़ अक्सर इलाज कराने में देरी कर देते हैं। इस कारण सामान्य सी बीमारी भी गंभीर रूप धारण कर लेती है और फिर बड़े ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ती है।

ई.एन.टी. संबंधी बीमारियाँ हर उम्र के लोगों को प्रभावित करती हैं। इनमें लंबे समय तक रहने वाले संक्रमण, सुनने की क्षमता में कमी, साइनस की बीमारी से लेकर मुँह और जीभ का कैंसर शामिल हैं। इनमें से अधिकतर बीमारियों का प्रभावी इलाज संभव है, परंतु डॉक्टरों का मानना है कि समय पर बीमारी की पहचान होने से स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है और मरीज़ के ठीक होने की संभावना भी काफी बढ़ जाती है।

‘द लैंसेट’ में प्रकाशित शोध के अनुसार सिर और गर्दन के कैंसर की समय पर पहचान न होने के कारण बीमारी गंभीर स्थिति में पहुँच जाती है। इससे इलाज मुश्किल हो जाता है और मरीज़ के ठीक होने की संभावना भी कम हो जाती है। इसलिए लंबे समय तक रहने वाले लक्षणों की समय पर जाँच करवाना बहुत आवश्यक है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा, “मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत पंजाब के पात्र मरीज़ों को सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में आधुनिक ईएनटी सर्जरी निःशुल्क उपलब्ध करवाई जा रही है। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार अब तक लगभग 2,030 मरीज़ों की ईएनटी सर्जरी की जा चुकी हैं, जिन पर करीब 5.25 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।”

डॉ. निधि गुप्ता, मेडिकल ऑफिसर (ईएनटी विशेषज्ञ), सिविल अस्पताल, रूपनगर (रोपड़) ने कहा, “लोग अक्सर कान से लगातार पानी बहना, सुनने की क्षमता घटना, नाक बंद रहना या मुँह के छालों जैसी समस्याओं को शुरुआती दौर में दर्द न होने के कारण नज़रअंदाज़ कर देते हैं। परंतु इलाज में देरी के कारण स्थायी रूप से बहरापन, क्रोनिक साइनस या गंभीर मुँह का कैंसर हो सकता है।”

ईएनटी से संबंधित बीमारियों में सबसे अधिक कानों की बीमारियाँ पाई जाती हैं। कानों का पुराना संक्रमण और सुनने की क्षमता में कमी, ईएनटी सर्जरी के सबसे आम कारण हैं। मरीज़ अक्सर कान से बार-बार पानी बहना, कम सुनाई देना, कान में आवाज़ (घंटी या भनभनाहट) आना या लंबे समय से संक्रमण की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास आते हैं।

राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (एसएचए), पंजाब के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले साढ़े पाँच महीनों के दौरान लगभग 1,050 कानों की सर्जरी की गईं, जिन पर करीब 2.9 करोड़ रुपये खर्च हुए। इनमें 897 टाइम्पेनोप्लास्टी, 88 रेडिकल मास्टोइडेक्टमी और कान की चोट तथा पिन्ना (बाहरी कान) के ट्यूमरों की सर्जरी शामिल हैं।

डॉ. गुप्ता ने कहा, “इनमें से अधिकांश ऑपरेशन फटे हुए कान के पर्दे की मरम्मत करने या कान के मध्य भाग में लंबे समय से मौजूद संक्रमण को दूर करने के लिए किए जाते हैं। समय पर सर्जरी करवाने से न केवल सुनने की क्षमता बहाल होती है, बल्कि संक्रमण को मास्टोइड हड्डी और आस-पास के महत्वपूर्ण अंगों तक फैलने से भी रोका जा सकता है।”


साँस लेने संबंधी समस्याओं को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है
लगातार नाक बंद रहने की समस्या को लोग सामान्य बात समझकर अनदेखा कर देते हैं, जबकि इसका सीधा असर नींद, काम करने की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय का साइनस संक्रमण, नाक की टेढ़ी हड्डी (डी.एन.एस.), बढ़े हुए टर्बीनेट्स और नाक के पॉलिप्स लंबे समय तक साँस लेने में कठिनाई के मुख्य कारण हैं।

राज्य स्वास्थ्य एजेंसी, पंजाब के अनुसार, मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत राज्य में लगभग 900 नाक और साइनस की सर्जरी की गईं, जिन पर 2.1 करोड़ रुपये से अधिक खर्च आया। इनमें 395 फंक्शनल सेप्टो राइनोप्लास्टी, 354 सेप्टोप्लास्टी, 227 फंक्शनल एंडोस्कोपिक साइनस सर्जरी (एफ.ई.एस.एस.) और अन्य सुधारात्मक सर्जरी शामिल हैं।

डॉ. गुप्ता ने कहा, “कई मरीज़ वर्षों तक केवल नाक वाले स्प्रे का उपयोग करते रहते हैं, परंतु असली कारण का इलाज नहीं करवाते। एंडोस्कोपिक सर्जरी दीर्घकालिक राहत देती है, साँस लेने में सुधार करती है और बार-बार होने वाले संक्रमण की संभावना को कम करती है।”


मुँह का कैंसर: मामले कम, परंतु गंभीरता काफी अधिक
यद्यपि मुँह और जीभ संबंधी सर्जरियों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है, परंतु विशेषज्ञों का कहना है कि देर से पता लगने के कारण ये ईएनटी की सबसे पेचीदा सर्जरियों में से एक मानी जाती हैं।

लगभग 80 मरीज़ों के मुँह और जीभ संबंधी ऑपरेशन किए गए, जिन पर करीब 25 लाख रुपये खर्च किए गए। इनमें शामिल हैं—

· मुँह, साइनस और गले के ट्यूमर निकालने की 47 सर्जरी
· 13 जीभ के ट्यूमर की सर्जरी, जिनमें गर्दन की लिम्फ नोड्स को हटाना (नेक डिसेक्शन) और फ्री फ्लैप रीकंस्ट्रक्शन शामिल था।
· 7 कंपोजिट रिसेक्शन और रीकंस्ट्रक्शन की सर्जरी।
· हेमीग्लोसेक्टोमी सहित अन्य बड़े ऑपरेशन।

डॉ. गुप्ता ने बताया कि मुँह का कैंसर अक्सर ऐसे छाले के रूप में शुरू होता है जो लंबे समय तक ठीक नहीं होता, या फिर मुँह में सफेद या लाल धब्बे, जीभ में दर्द या निगलने में कठिनाई के रूप में सामने आता है। तम्बाकू, गुटखा, सुपारी और शराब इसके मुख्य कारक हैं।

डॉ. गुप्ता ने आगे कहा कि यदि मुँह का कोई छाला दो सप्ताह से अधिक समय तक बना रहे तो उसे कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। ‘द लैंसेट’ सहित अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि कैंसर की पहचान में देरी होने से यह गंभीर स्थिति में पहुँच जाता है और उपचार के परिणाम भी प्रभावित होते हैं। डॉ. गुप्ता ने कहा, “यदि कैंसर की पहचान शुरुआत में ही हो जाए तो इसका इलाज अक्सर छोटे ऑपरेशन से संभव है। परंतु देर से पता लगने पर बड़े ऑपरेशन, रीकंस्ट्रक्शन और अतिरिक्त उपचार की आवश्यकता पड़ती है।”

गंभीर मामलों में गर्दन की लिम्फ नोड्स को हटाने की सर्जरी और शरीर के किसी अन्य भाग से टिशू लेकर मुँह की संरचना को पुनः तैयार करने (रीकंस्ट्रक्शन) की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे मरीज़ की बोलने और निगलने की क्षमता को पुनः बहाल किया जाता है।


जागरूकता से गंभीर बीमारियों से बचाव संभव
डॉक्टरों का कहना है कि अधिकांश ईएनटी से संबंधित पेचीदगियों को समय पर पहचान और सही इलाज के माध्यम से रोका या सफलतापूर्वक ठीक किया जा सकता है।

यदि कान से लगातार पानी बहता रहे, सुनने की क्षमता घटने लगे, नाक लंबे समय तक बंद रहे, बार-बार साइनस का संक्रमण हो, आवाज़ लगातार बैठी रहे या मुँह का छाला दो सप्ताह से अधिक समय तक ठीक न हो तो तुरंत किसी ईएनटी विशेषज्ञ से जाँच करवानी चाहिए। डॉ. गुप्ता ने कहा, “समय पर विशेषज्ञ से सलाह करने का मतलब है आसान इलाज, जल्दी स्वास्थ्य लाभ और दीर्घकालिक बेहतर परिणाम।”

अंत में उन्होंने जोर देकर कहा कि मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत एडवांस्ड ईएनटी सर्जरी की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बना रही है। परंतु, इसका सबसे बड़ा लाभ तभी मिलेगा जब लोग जागरूक होंगे, समय पर जाँच करवाएंगे और बीमारी के शुरुआती चरण में ही इलाज शुरू करवाएंगे। इससे बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है और बड़े ऑपरेशनों की आवश्यकता भी काफी हद तक घटाई जा सकती है।

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