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राष्ट्रीय

आचार्य प्रशांत ने सोनम वांगचुक से अनशन तोड़ने का किया आग्रह, सरकार से संवाद की अपील की

Updated on Thursday, July 16, 2026 12:02 PM IST

दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने नीट यूजी पेपर लीक और छात्रों की आत्महत्या के बाद खड़े हुए आंदोलन पर बात की। उन्होंने कहा कि यह संकट केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि "हमारे शिक्षा तंत्र और समाज के किसी अधिक गहरे संकट का संकेत" है।

जंतर-मंतर पर जारी छात्र प्रदर्शन और शिक्षाविद सोनम वांगचुक के अठारह दिन से चल रहे अनशन के बीच उन्होंने वांगचुक से अनशन तोड़ने का आग्रह किया और सरकार से संवाद की अपील की।

गोवा में मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि इतने गंभीर मामले पर त्वरित प्रतिक्रिया देने के बजाय ठहरकर सोचना जरूरी है। संकट की मानवीय गहराई की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा, "22 लाख आवेदक, यानी 22 लाख परिवार। इन छात्रों में किसी ने दो साल, किसी ने चार, किसी ने पांच साल लगाए। इन्होंने खेल के मैदान छोड़े, बचपन छोड़ा, त्योहार-उत्सव छोड़े और जब इन्हें पता चलता है कि पेपर लीक हो गया, तो सिर्फ एक परीक्षा नहीं टूटती, इनका भरोसा टूट जाता है।"

उन्होंने कहा कि "वे इस निष्कर्ष के साथ अपना पूरा जीवन जीते हैं कि सच्चाई, ईमानदारी, ज्ञान और श्रम की कोई कीमत नहीं, आगे तो वही निकलेगा जो बेईमान है और जिसके पास पैसा है।" भारत में एक छात्र की तैयारी पूरा परिवार मिलकर कराता है, इसलिए इस टूटन का बोझ पूरे परिवार पर पड़ता है। उन्होंने माना कि आरोपों के बाद प्रशासन कार्रवाई करता है, परीक्षाएं दोबारा ली जाती हैं और गिरफ्तारियां भी होती हैं लेकिन हर वर्ष दोहराई जा रही इन घटनाओं ने युवाओं का बुनियादी भरोसा हिला दिया है।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि किसी का भीतर से टूट जाना अपने आप में एक बड़ा आत्मघात है, जिसके आंकड़े कभी दर्ज ही नहीं होते।

वांगचुक पर उन्होंने कहा कि उनका पूरा जीवन ही उनकी गंभीरता की गवाही है। "जितना उनका ट्रैक रिकॉर्ड गवाही देता है, वे एक गंभीर और सच्चे व्यक्ति हैं। लद्दाख जैसे सूखे, ठंडे रेगिस्तान में, जहां औपचारिक व्यवस्था शिक्षा तक नहीं पहुंचा पाई, उन्होंने बच्चों को स्कूल तक पहुंचाया। उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि शिक्षा रट्टा मारने का नाम नहीं, सही जीवन जीने का नाम भी है।"

उन्होंने कहा, "व्यवस्था में जो धांधली है, उसके खिलाफ जरूर लड़िए, यह आपका अधिकार है। पर भीतर अगर बोध नहीं जागा, तो बाहर कितने ही बदलाव ले आइए, चीजें अपने नाम और रूप बदलकर वैसी की वैसी रह जाएंगी।" संतों के दर्शन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि 'माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर'; बाहर-बाहर घुमाने से बात दूर तक नहीं जाती। व्यवस्था हम ही बनाते हैं। अगर हम भीतर से गड़बड़ हैं, तो दिन में अच्छी व्यवस्था बनाएंगे और रात में अपने ही बनाए दरवाजों से चोरी से निकल जाएंगे।"

आचार्य प्रशांत ने कहा, "हमें केवल व्यावसायिक शिक्षा नहीं चाहिए, हमें आत्म की सामूहिक शिक्षा, ‘मास- एजुकेशन-ऑफ-द-सेल्फ’ चाहिए। अगर हम इससे बचते रहे, तो ऐसे हादसे बार-बार होते रहेंगे और हमारे बच्चों की जानें कभी किसी बहाने, कभी किसी और बहाने जाती रहेंगी।"

आचार्य प्रशांत ने कहा कि भारत के लिए उनके पास कोई अपील नहीं, एक प्रश्न है। उन्होंने कहा, "ऐसा कैसे होता है कि जब भी कोई घटना घटती है, हमें उसका सिर्फ बाहरी पक्ष दिखता है, उसकी जड़ कभी नहीं दिखती? हम उत्सुक रहते हैं कि उंगली बाहर की ओर उठा दें, कि वह जिम्मेदार है, वह जिम्मेदार है। बाहर वाले जिम्मेदार होते ही हैं, पर क्या हम ईमानदारी से यह भी मानेंगे कि उतनी ही जिम्मेदारी भीतर वाले की है?"

सरकार से उन्होंने संवाद का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा, "बातचीत तो सज्जनता की निशानी है, संवाद शील का प्रमाण है। लोकतंत्र को यह शोभा नहीं देता कि सिर्फ बात करने के लिए एक समझदार और सम्माननीय नागरिक को अपने प्राण दांव पर लगाने पड़ें।"

उन्होंने कहा, "इसमें दो घटनाएं हैं। पहली, जिसकी सब चर्चा कर रहे हैं, कि व्यवस्था टूटी, पेपर लीक हुआ। पर दूसरी घटना ज्यादा गहरी है और वह छुपी हुई है। किसी ने हमारे युवाओं को यह सिखा दिया कि एक रैंक की कीमत उनकी जिंदगी से ज्यादा है।"

उन्होंने कहा, "पेपर तभी लीक होते हैं जब कोई बेचने वाला हो और कोई भारी पैसे देकर खरीदने वाला भी। बाईस लाख अभ्यर्थी और कुछ हजार सीटें, इतनी भगदड़ में दलाल पैदा होंगे ही। लीक होना इस बाजार में घटी कोई दुर्घटना नहीं, इस बाजार का उत्पाद है। दोनों पक्षों ने मान लिया है कि इस कागज की कीमत बहुत ऊंची है।" उन्होंने पूछा कि यह बाजार सजाया किसने। "यह न उस दलाल ने सजाया जिसने पेपर लीक किया, न किसी मंत्रालय ने। यह मूल्य-व्यवस्था घर में बनी है, रिश्तेदारों की बैठकों में बनी है, अभिभावकों की निगरानी में बनी है।"

अभिभावकों से सवाल करते हुए उन्होंने कहा, "आपके घर एक साधारण, सुंदर बच्चा जन्मा था। आपने उसे एंट्रेंस एग्जाम का प्रोजेक्ट कब बना दिया? अगर आप उससे प्रेम करते, तो उसकी आत्म-गरिमा को किसी एक परीक्षा के परिणाम से न बांधते।" उन्होंने कहा, "एक जो जीविका देती है और एक जो जीवन देती है।" पर शिक्षकों ने बच्चे के सामने केवल जीविका की दौड़ रख दी और शिक्षा को व्यक्ति के विकास के बजाय उसके दमन का जरिया बना दिया।

आचार्य ने कहा, "आपने अपने भविष्य का जो मॉडल बनाया है, वह आपको दिया किसने? अगर वह सचमुच आपका अपना होता, तो एक सीट के पीछे दस-दस हज़ार लोग एक ही दिशा में न दौड़ रहे होते। सब कहते हैं कि हम अद्वितीय हैं, तो फिर सब एक ही दौड़ में क्यों हैं? यह आयातित सपना है, यह रोपी गई इच्छा है।"

अपनी बात को एक रूपक से स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आज की दुनिया हर संकट में उस समाज की तरह बरतती है जो नशे में धुत चालक की हालत सुधारने के बजाय बेहतर सड़कें बनाता है।

 

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