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उत्तर प्रदेश

आज तय होंगे राम मंदिर के नए ट्रस्टी, दो नाम सबसे आगे, चंपत की जगह कौन, सीईओ पर भी सस्पेंस

Updated on Wednesday, July 22, 2026 11:06 AM IST

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में ट्रस्टियों के तीन रिक्त पद भरने के लिए अलग-अलग स्तर पर चल रही मंथन की प्रक्रिया को अब अंतिम रूप दिया जा चुका है। इसके लिए संगठन के अलावा संघ नेतृत्व के निर्देश पर मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों के नामों पर भी मंथन किया गया। करीब आधा दर्जन संतों के नाम पर अंतिम फैसला होना है। इसमें अयोध्या से जुड़े दो संतों का नाम सबसे आगे है। वहीं, चंपत राय की जगह कृष्ण मोहन को पूर्णकालिक महासचिव बनाने पर संशय है। सीईओ को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है। बहुत ज्यादा नाम आने के कारण फिलहाल अंतिम तीन पर फैसला होने की संभावना नहीं है।


राम मंदिर में दान चोरी के बाद निशाने पर आए ट्रस्ट से महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया है। अयोध्या नरेश के निधन से एक पद पहले से ही खाली चल रहा है। पिछली बैठक में चंपत राय की जगह कृष्ण मोहन को कार्यवाहक महासचिव तो बना दिया गया लेकिन ट्रस्टियों पर फैसला टल गया था।


नियमित ट्रस्टी के लिए चल रहे यह दो नाम
ट्रस्टी के लिए अयोध्या के संतों को प्राथमिकता देने के पीछे सबसे बड़ी वजह तीनों रिक्त पदों के पदाधिकारियों का अयोध्या से जुड़ा होना है। संघ की ओर से जिन आधा दर्जन संतों के नामों का अंतिम रूप से विचार के लिए चयन किया गया है उनमें अयोध्या के मनीषी आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण व स्वामी राजकुमार दास का नाम नियमित ट्रस्टी के लिए चल रहा है। इसके अलावा राजकुमार दास संघ के भारतीय शिक्षण मंडल के माध्यम से गुरुकुल स्थापना के आयाम से जुड़े हैं, वहीं संत समाज में भी उनका विशेष प्रभाव है।


इसी तरह आचार्य मिथिलेश नंदिनी भी संघ के वैचारिक अधिष्ठान से जुड़े हैं और देश भर में प्रबुद्ध वर्ग के व्याख्यानों में बड़ी प्रखरता और तार्किकता के साथ विषय का प्रस्तुतिकरण करते हैं। हिंदी-उर्दू व संस्कृत समेत अंग्रेजी भाषा में भी उनके पांडित्य को विद्वत समाज ने स्वीकार किया है।


कौन-कौन आमंत्रित सदस्य
मणिराम छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास पहले से ट्रस्ट के आमंत्रित सदस्य हैं। उनके गुरुदेव महंत नृत्यगोपाल दास ट्रस्ट के अध्यक्ष ही हैं। वहीं रंगमहल के महंत रामशरण दास व रामकथा कुंज के महंत डा. रामानंद दास राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। यह सभी संत रामानंदीय परम्परा के संत हैं। इसके अलावा मंदिर आंदोलन के अग्रणी संतों में शामिल कोशलेश सदन पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य विद्या भास्कर का भी नाम है। यह सभी ट्रस्ट के नियमित सदस्य तत्काल मनोनीत न भी हों तो भी इन्हें आमंत्रित सदस्य बनाया जाना तय है। राम मंदिर ट्रस्ट के आमंत्रित सदस्यों में अभी तीन ही सदस्य थे। विहिप के केन्द्रीय संयुक्त मंत्री गोपाल राव के बाहर होने के बाद दो सदस्य शेष हैं जिनमें महंत कमलनयन दास के अलावा विहिप के केन्द्रीय संरक्षक दिनेश शामिल हैं।

 

विहिप के प्रन्यासी मंडल ने यह दो नाम बढ़ाए
अयोध्या। विहिप के प्रन्यासी मंडल की दिल्ली में हुई दो दिवसीय बैठक में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों के रिक्त पदों के लिए दो नामों का प्रस्ताव किए जाने की खबरें आ रही हैं। सूत्रों का कहना है कि इनमें एक नाम विहिप के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल बांगड़ा का है। बताया गया कि यह ट्रस्टी के साथ -साथ ट्रस्ट महासचिव पद के भी दावेदार हैं।


इनका नाम छह जुलाई की बैठक में भी आया था। इनके साथ बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक नीरज दानोदिया का नाम भी शामिल था। इसी कारण दोनों छह जुलाई को अयोध्या में ही थे लेकिन ट्रस्ट की बैठक में ही मतभेद के कारणों से नये नाम के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया गया। फिलहाल एक बार फिर बीएल बांगड़ा के नाम की चर्चा जोरों पर है।


सूत्रों की मानें तो विहिप की ओर से ट्रस्टी के लिए अन्तर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हुकुम चंद्र सांवला का नाम भी प्रस्तावित करने की चर्चा है। यह भी सूचना है कि सांवला स्वास्थ्य कारणों से ट्रस्टी बनने के इच्छुक नहीं हैं।


उधर छह जुलाई की बैठक में निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास ने अपनी ओर से अयोध्या राज परिवार के सदस्य व युवा साहित्यकार एवं अध्येता यतीन्द्र मिश्र के नाम का प्रस्ताव किया था। श्री मिश्र कला-संस्कृति से भी जुड़े होने के कारण राम मंदिर के विभिन्न आयामों में सहयोगी की भूमिका निभाते रहे हैं।


कृष्ण मोहन के पूर्णकालिक महासचिव बनने पर संशय
ट्रस्ट में अंतरिम महासचिव के रूप में कृष्ण मोहन की भूमिका को लेकर अब चर्चाएं तेज हो गई हैं। पिछले 15 दिनों के घटनाक्रम से ऐसे संकेत मिल रहे हैं। उन्होंने खुद को मुख्य रूप से वित्तीय प्रबंधन तक सीमित रखा, जबकि मंदिर के दैनिक संचालन और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी अन्य पदाधिकारियों के माध्यम से चलती रही। पूर्णकालिक महासचिव के नाम पर बुधवार को अंतिम मुहर ट्रस्ट के उच्च स्तर पर ही लगेगी।

जानकारी के अनुसार, 15 जुलाई तक विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव मंदिर के दैनिक संचालन और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की निगरानी करते रहे, जबकि ट्रस्ट सदस्य जिनेंद्र दास पूजा-अर्चना और धार्मिक व्यवस्थाओं का दायित्व संभालते रहे।

गोपाल राव ने बातचीत में यह स्वीकार किया था कि उन्हें पंद्रह तक कामकाज पूर्ववत देखने को कहा गया था। दूसरी ओर कृष्ण मोहन का अधिक फोकस वित्तीय मामलों, लेखा-जोखा और संबंधित व्यवस्थाओं की मॉनिटरिंग पर रहा।

सूत्रों का यह भी दावा है कि इस दौरान कृष्ण मोहन समय-समय पर पूर्व महासचिव चंपत राय से मुलाकात कर विभिन्न विषयों पर दिशा-निर्देश लेते रहे। कहा यह भी जा रहा है कि इसमें कुछ गलत नहीं था। चंपत राय लंबे समय से व्यवस्था में रहे। उन्हें जानकारी ज्यादा थी। लिहाजा उनके अनुभव के सहारे ही कृष्ण मोहन कामकाज को निपटाते रहे।


महासचिव के हस्ताक्षर वाले काम लंबित
बीते 15 दिनों में ट्रस्ट के कई प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित होने की चर्चा है। बताया जा रहा है कि जिन मामलों में महासचिव के हस्ताक्षर आवश्यक थे, उनमें निर्णय लंबित रहे। इसी कारण कुछ कर्मचारियों का जून माह का वेतन भी समय पर जारी नहीं हो सका। सूत्रों के अनुसार, अंतरिम कार्यकाल के दौरान कई अवसरों पर यह भी कहा गया कि ‘इन विषयों पर निर्णय पूर्णकालिक महासचिव ही लेंगे, तब तक व्यवस्था इसी प्रकार चलाइए।’ इससे यह अटकलें और तेज हो गई हैं कि वर्तमान व्यवस्था केवल अंतरिम है और स्थायी महासचिव की नियुक्ति को लेकर अंतिम फैसला ट्रस्ट अपनी बुधवार की बैठक में सर्वसम्मति से लेगा।


सीईओ चयन पर चर्चा मुश्किल
ट्रस्ट की बुधवार को प्रस्तावित बैठक में ट्रस्ट के पहले मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) के चयन पर चर्चा हो पाना मुश्किल है। वजह बताई जा रही है कि सीईओ के लिए इतने आवेदन आ गए हैं कि उनकी स्क्रीनिंग चार दिन में संभव नहीं है। इस नाते चयन समिति सीईओ के लिए तीन नाम बुधवार तक प्रस्तावित नहीं कर सकती। जब सीईओ के लिए नाम नहीं आएंगे तो ट्रस्ट की बैठक में चर्चा भी संभव नहीं होगी।


चढ़ावा चोरी के बाद 6 जुलाई को आयोजित तीर्थ क्षेत्र की बैठक में मंदिर प्रबंधन पर चर्चा हुई। इसी बैठक में तय किया गया कि मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए पेशेवर अधिकारी की नियुक्ति की जाए, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। साथ ही मंदिर की व्यवस्था के लिए एक इकोसिस्टम तैयार किया जा सके। यहीं मुख्य कार्यपालक अधिकारी नियुक्त करने का फैसला लिया गया था। इसके चयन के लिए तीन सदस्यीय विशेषज्ञ कमेटी गठित की गई।

 

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