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स्वास्थ्य

बाहरी दुनिया के शोर से पाएं मुक्ति, अपनाएं कर्णपीड़ासन और बढ़ाएं मानसिक एकाग्रता

Updated on Sunday, July 26, 2026 16:26 PM IST

आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक शांति बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में कर्णपीड़ासन को एक महत्वपूर्ण योगासन माना जाता है। यह शरीर के लचीलेपन को बढ़ाने में सहायक माना जाता है और नियमित अभ्यास से तंत्रिका तंत्र को शांत रखने तथा मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। संस्कृत में यह शब्द तीन भागों से मिलकर बना है- 'कर्ण', जिसका अर्थ कान है; 'पीड़ा', यानी दबाव या खिंचाव; और 'आसन', अर्थात मुद्रा। इस योग मुद्रा में घुटनों द्वारा कानों पर हल्का दबाव डाला जाता है। योग परंपरा के अनुसार, यह आसन बाहरी व्यवधानों से ध्यान हटाकर व्यक्ति को अपने भीतर की चेतना और एकाग्रता पर केंद्रित करने में सहायक माना जाता है। आयुर्वेद और योग परंपरा में कर्णपीड़ासन को हलासन का एक उन्नत रूप बताया गया है। नियमित अभ्यास से यह रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन, पाचन क्रिया और मानसिक शांति में सहायक माना जाता है। यह आसन सामान्यतः हलासन और सर्वांगासन के बाद किया जाता है। इसमें पेट और कमर की मांसपेशियां शरीर के संतुलन को बनाए रखने में सक्रिय रहती हैं।


इसे करने के लिए सबसे पहले पीठ के बल सीधे लेट जाएं और हथेलियों को जमीन की ओर रखें। फिर सांस लेते हुए पैरों को ऊपर उठाएं और उन्हें सिर के पीछे ले जाकर हलासन की मुद्रा बनाएं। इसके बाद धीरे-धीरे घुटनों को मोड़ते हुए कानों के दोनों ओर जमीन पर टिकाने का प्रयास करें। हाथों को पीठ के सहारे रखें या जमीन पर सीधा रखें। सामान्य गति से सांस लेते हुए 30 से 60 सेकंड तक इस स्थिति में रहें।


नियमित अभ्यास से यह आसन तनाव कम करने तथा मानसिक एकाग्रता और स्थिरता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। हालांकि, गर्दन या रीढ़ की गंभीर चोट, हर्निया, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा अथवा अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित लोगों को यह आसन केवल योग्य योग प्रशिक्षक या चिकित्सक की सलाह पर ही करना चाहिए।

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