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स्वास्थ्य

बच्चों की बातचीत का पैटर्न बताता है भविष्य में कैसी रहेगी उनकी मेंटल हेल्थ, नए शोध में खुलासा

Updated on Saturday, August 01, 2026 18:55 PM IST

क्या किसी बच्चे के बोलने के तरीके से यह पता लगाया जा सकता है कि भविष्य में उसे डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं? सुनने में यह बात थोड़ी हैरान करने वाली लग सकती है, लेकिन एक नए शोध में कुछ ऐसा ही सामने आया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे क्या बोलते हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे कैसे बोलते हैं। यानी उनके शब्दों को जोड़ने का तरीका, वाक्य बनाने का अंदाज और बातचीत की शैली भविष्य में उनकी मानसिक सेहत के बारे में अहम संकेत देती है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मेंटल हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। इसमें स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 9 से 13 साल की उम्र के 200 से ज्यादा बच्चों का अध्ययन किया। बच्चों से उनके जीवन में हुई तनावपूर्ण घटनाओं के बारे में लगभग डेढ़ घंटे तक बातचीत की गई। इन इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग को बाद में चार नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग सिस्टम से विश्लेषित किया गया।


सभी मॉडल्स इस बात का काफी सटीक अनुमान लगाने में सफल रहे कि अगले छह सालों में किन बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं विकसित होने की संभावना है।
शोध के प्रमुख लेखक और स्टैनफोर्ड स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड साइंसेज में न्यूरोसाइंस के डॉक्टरेट स्टूडेंट चेस एंटोनैकी के अनुसार, यह अध्ययन इस बात का मजबूत प्रमाण है कि भविष्य में ऐसे आसान और बड़े स्तर पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले उपकरण विकसित किए जा सकते हैं, जो बीमारी सामने आने से पहले ही जोखिम वाले बच्चों की पहचान कर सकें।
शोधकर्ताओं ने पाया कि बच्चों की बातचीत का स्टाइल, यानी वे "और", "लेकिन", "से", "तक" जैसे छोटे-छोटे जोड़ने वाले शब्दों का कितना और कैसे इस्तेमाल करते हैं, यह उनके मानसिक स्वास्थ्य का ज्यादा सटीक संकेत देता है। वहीं उन्होंने किस घटना का जिक्र किया, यह अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण साबित हुआ।


किशोरावस्था के समय डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी समस्याएं अक्सर शुरू होती हैं। एक बार ये बीमारियां विकसित हो जाएं तो उनका इलाज आसान नहीं होता। ऐसे में अगर पहले ही यह पता चल जाए कि कौन-सा बच्चा जोखिम में है, तो समय रहते उसकी काउंसलिंग और मदद की जा सकती है।
अब तक बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य के खतरे का आकलन करने के लिए डॉक्टरों की जांच, तनाव वाले हार्मोन कॉर्टिसोल की जांच, शरीर की तनाव प्रतिक्रिया या अन्य वैज्ञानिक परीक्षणों का सहारा लिया जाता था। लेकिन ये तरीके महंगे, समय लेने वाले और बड़े स्तर पर लागू करना मुश्किल हैं। इसके मुकाबले बातचीत का विश्लेषण करना कहीं ज्यादा आसान, सस्ता और व्यावहारिक तरीका हो सकता है।


यह अध्ययन स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कई वर्षों से चल रही एक दीर्घकालिक रिसर्च का हिस्सा है। इसमें बच्चों के जीवन, पारिवारिक माहौल और तनावपूर्ण अनुभवों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। पहले विशेषज्ञ बच्चों के इंटरव्यू सुनकर उनके तनाव का एक अंक तय कर देते थे, लेकिन शोधकर्ताओं को लगा कि इससे बातचीत की कई महत्वपूर्ण बारीकियां नजरअंदाज हो जाती हैं। इसी वजह से नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग मॉडल्स का इस्तेमाल करके इंटरव्यूज़ को एनालाइज किया गया।


शोध में यह भी सामने आया कि जिन बच्चों ने बातचीत के दौरान गंभीर शारीरिक हिंसा, मारपीट, गला दबाने जैसी घटनाओं या सामाजिक रूप से अलग-थलग किए जाने की बात कही, उनमें भविष्य में मानसिक समस्याओं का खतरा अधिक था। वहीं जिन बच्चों ने दोस्तों, परिवार के सहयोग, खेलकूद, स्कूल क्लब या सकारात्मक गतिविधियों का जिक्र किया, उनमें मानसिक रूप से मजबूत बने रहने की संभावना ज्यादा दिखी।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी इस तकनीक को और बड़े स्तर पर परखने की जरूरत है। अगर आगे भी ऐसे ही नतीजे मिलते हैं, तो भविष्य में केवल स्मार्टफोन पर रिकॉर्ड की गई बच्चों की सामान्य बातचीत का विश्लेषण करके यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन-सा बच्चा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जोखिम में है। इससे समय रहते सही सलाह, काउंसलिंग और उपचार शुरू किया जा सकेगा।

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