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स्वास्थ्य

मानसून में क्यों बढ़ रहे हैं फ्लू के मामले? एम्स के डॉक्टर ने बताए लक्षण और बचाव के उपाय

Updated on Saturday, August 01, 2026 18:56 PM IST

मानसून का मौसम अपने साथ राहत तो लेकर आता है, लेकिन इसी मौसम में वायरल संक्रमण और फ्लू के मामले भी तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसको लेकर दिल्ली स्थित एम्स के मेडिसिन विभाग के डॉक्टर संजीव सिन्हा ने आईएएनएस से खास बातचीत की। उन्होंने कहा कि इन दिनों अस्पताल की ओपीडी में खांसी, जुकाम, बुखार और शरीर दर्द जैसी शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ गई है। डॉ. संजीव सिन्हा के मुताबिक, इन दिनों मरीजों में सबसे आम लक्षण गले में खराश, नाक बहना, सूखी खांसी, तेज बुखार, सिरदर्द और पूरे शरीर में दर्द हैं। कई मरीज कमजोरी और थकान की भी शिकायत कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण की तरह लग सकते हैं, लेकिन कई मामलों में यह इन्फ्लूएंजा वायरस का संक्रमण भी हो सकता है। इसलिए लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि कुछ लोगों में इस संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। इनमें 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, पांच साल से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, किडनी की बीमारी, कैंसर या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज शामिल हैं। ऐसे लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है, इसलिए उनमें संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है।


डॉक्टर ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को तेज बुखार, लगातार खांसी, गले में दर्द और शरीर में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, खासकर यदि वह हाई रिस्क श्रेणी में आता है, तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। जांच और इलाज डॉक्टर की सलाह के अनुसार शुरू करना बेहद जरूरी है।
डॉ. सिन्हा ने बताया कि शुरुआत में डॉक्टर मरीज के लक्षणों के आधार पर क्लिनिकल डायग्नोसिस करते हैं। यदि इन्फ्लूएंजा का संदेह होता है तो गले या नाक से स्वैब लेकर आरटी-पीसीआर जांच की जाती है। इसी जांच से यह पता चलता है कि मरीज को वास्तव में इन्फ्लूएंजा है या नहीं और यदि है तो कौन-सा स्ट्रेन, जैसे एच1एन1 या एच3एन2, जिम्मेदार है।
उन्होंने बताया कि अगर जांच में इन्फ्लूएंजा की पुष्टि हो जाती है, तो मरीज को एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। इसके साथ ही बुखार कम करने के लिए पैरासिटामोल, पर्याप्त आराम और खूब पानी पीने की सलाह दी जाती है। तेज बुखार की वजह से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसलिए मरीज को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है।


डॉ. सिन्हा ने कहा कि जिन लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, उन्हें कम से कम दो से तीन दिन तक घर में रहकर खुद को आइसोलेट करना चाहिए। इस दौरान मास्क पहनना जरूरी है ताकि संक्रमण परिवार के अन्य लोगों तक न पहुंचे। अगर किसी कारणवश बाहर जाना पड़े, तो भी मास्क का इस्तेमाल करें और भीड़भाड़ वाली जगहों से बचें। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को रुमाल, टिश्यू या तौलिये से ढंकना चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि इन्फ्लूएंजा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बहुत तेजी से फैलता है। जब संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के जरिए वायरस दूसरे व्यक्ति तक पहुंच जाता है। यदि सामने वाला व्यक्ति इन बूंदों के संपर्क में आता है या उन्हें सांस के साथ अंदर ले लेता है, तो संक्रमण फैल सकता है।


एम्स में मामलों की संख्या बढ़ने के सवाल पर डॉ. सिन्हा ने कहा कि मानसून के दौरान ऐसे मरीज हर साल बढ़ते हैं। उन्होंने बताया कि इस मौसम में कभी लगातार बारिश होती है तो कभी अचानक गर्मी बढ़ जाती है। तापमान और नमी में बार-बार होने वाला यह बदलाव वायरस के फैलने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। इसलिए जुलाई-अगस्त के दौरान फ्लू और अन्य वायरल संक्रमण अधिक देखने को मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि तेज बुखार कई दिनों तक बना रहे, सांस लेने में परेशानी हो, ऑक्सीजन कम महसूस हो, मरीज भ्रमित दिखे या कमजोरी बहुत ज्यादा हो जाए, तो बिना देरी किए नजदीकी अस्पताल या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर इलाज मिलने से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।


डॉ. सिन्हा ने यह भी चेतावनी दी कि यदि समय पर इलाज न कराया जाए, तो यह संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। खासकर बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों में वायरस फेफड़ों तक पहुंचकर निमोनिया का कारण बन सकता है। ऐसी स्थिति में मरीज का ऑक्सीजन स्तर गिर सकता है, सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और उसे अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ सकती है।

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