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दुनिया

दक्षिण कोरिया के 'नो थैंक्स' कहने से क्या नाराज थे ट्रंप? पहले ही दे दिया था संकेत

Updated on Monday, August 17, 2026 13:46 PM IST

वाशिंगटन । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिलो दिमाग में क्या चल रहा है इसका संकेत पहले ही दे देते हैं। ठीक ऐसा ही कुछ उन्होंने दक्षिण कोरिया के मामले में किया। रविवार शाम दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यासों में ‘बड़ी कटौती’ का आदेश देकर भले ही उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन के साथ रिश्तों को सुधारने का संकेत दिया हो, लेकिन इस फैसले से कुछ घंटे पहले उनके एक बयान ने सोल के साथ बढ़ती तल्खी का संकेत दे दिया था। ये 'नो थैंक्स' मोमेंट था।

ट्रंप ने शनिवार को नॉर्थ कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ तस्वीर साझा की। कहा कि तस्वीरों में वो भले ही अनमने दिख रहे हैं लेकिन दोनों के बीच रिश्ते बड़े अच्छे हैं। फिर रविवार सुबह ट्रुथ सोशल मीडिया पर कहा कि उन्होंने हाल में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग से पूछा था कि क्या सोल ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के अमेरिकी प्रयास में शामिल होना चाहेगा। ट्रंप के मुताबिक, उन्हें जवाब मिला-“ नो थैंक्स (नहीं, धन्यवाद)।” हालांकि इसके साथ उन्होंने इस बातचीत का कोई ब्योरा नहीं दिया।

लेकिन इसके बाद ट्रंप ने जिस तरह दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यासों पर टिप्पणी की, उससे दोनों घटनाओं को जोड़कर देखने की वजह जरूर बनती है। उसी पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि उन्होंने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यासों को ‘काफी हद तक’ कम करने का निर्देश दिया है। उन्होंने अभ्यासों को महंगा बताते हुए कहा कि इनकी लागत का बड़ा हिस्सा अमेरिका उठाता है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि ये अभ्यास उत्तर कोरिया को ‘पूरी तरह अनुचित और शत्रुतापूर्ण’ संदेश भेजते हैं।

'नो थैंक्स' से क्या ट्रंप नाराज हुए? सवाल ये मौजूं है। ट्रंप के बयान का सबसे अहम हिस्सा यही है। दक्षिण कोरिया अमेरिका का प्रमुख एशियाई सहयोगी है और उसकी धरती पर करीब 28,500 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ऐसे में ट्रंप का यह कहना कि सोल ने ईरान के मुद्दे पर अमेरिकी प्रयास में शामिल होने से इनकार कर दिया, केवल एक सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी नहीं माना जा सकता।

योनहाप के मुताबिक, ट्रंप के इस बयान से यह धारणा बनती है कि ईरान के साथ जारी युद्ध के दौरान उन्हें दक्षिण कोरिया जैसे सहयोगियों से उतना समर्थन नहीं मिला, जितनी वह अपेक्षा कर रहे थे। इससे पहले अप्रैल में व्हाइट हाउस के एक कार्यक्रम में भी ट्रंप दक्षिण कोरिया को अमेरिका के लिए ‘मददगार नहीं’ बता चुके थे।

यानी सैन्य अभ्यासों में कटौती का फैसला अचानक उठाया गया कदम नहीं लगता। इसके ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से यह बता दिया था कि सोल से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने की शिकायत है।

यहां कहानी का दूसरा पहलू उत्तर कोरिया भी है। ट्रंप ने साफ कहा कि उनका फैसला किम जोंग-उन के साथ उनके ‘बहुत अच्छे संबंधों’ को ध्यान में रखकर लिया गया है। उन्होंने कहा कि वह ऐसे सैन्य अभ्यासों से खुश नहीं हैं, जिन्हें प्योंगयांग लंबे समय से युद्ध की तैयारी करार देता रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि सैन्य अभ्यासों में कटौती की घोषणा से एक दिन पहले ट्रंप ने 2019 में पनमुनजोम में किम के साथ हुई मुलाकात की तस्वीर भी सोशल मीडिया पर साझा की थी और दोहराया था कि दोनों के बीच संबंध ‘बहुत अच्छे’ हैं।

यह संकेत देता है कि ट्रंप एक तरफ सोल से अपने रणनीतिक सहयोग को लेकर असंतोष जता रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्योंगयांग के साथ व्यक्तिगत कूटनीति की खिड़की फिर से खोलना चाहते हैं।

अमेरिका और दक्षिण कोरिया का सुरक्षा गठबंधन दशकों पुराना है और उत्तर कोरिया का परमाणु एवं मिसाइल कार्यक्रम दोनों देशों के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है।

इसके बावजूद ट्रंप का मौजूदा रुख असामान्य जरूर है। जिस समय उत्तर कोरिया अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है और हाल में बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण भी कर चुका है, उसी समय अमेरिकी राष्ट्रपति संयुक्त सैन्य अभ्यासों को कम करने की बात कर रहे हैं।

उत्तर कोरिया ने हालिया संयुक्त सैन्य अभ्यासों की आलोचना करते हुए इन्हें युद्ध की तैयारी बताया था। दूसरी ओर, अमेरिका और दक्षिण कोरिया इन्हें अपनी सैन्य तैयारी और प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने का जरूरी हिस्सा मानते हैं।

ट्रंप के फैसले को केवल कोरियाई प्रायद्वीप तक सीमित करके देखना भी सही नहीं होगा। ईरान संघर्ष पांच महीने से अधिक समय से चल रहा है और इसने अमेरिका की विदेश नीति, ऊर्जा कीमतों और घरेलू राजनीति पर दबाव बढ़ाया है। योनहाप के अनुसार, कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि सैन्य अभ्यासों में कटौती से ट्रंप ईरान युद्ध से जुड़े घरेलू दबाव से भी ध्यान हटाने की कोशिश कर सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप की यह रणनीति किम जोंग-उन को बातचीत की मेज पर वापस ला पाएगी। अमेरिका ने पहले ही संकेत दिया है कि ट्रंप प्योंगयांग के साथ बिना पूर्व शर्त बातचीत के लिए तैयार हैं।

दक्षिण कोरिया के लिए भी यह फैसला आसान नहीं है। एक तरफ राष्ट्रपति ली जे-म्युंग उत्तर कोरिया के साथ संवाद और स्थायी शांति व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। दूसरी तरफ प्योंगयांग लगातार अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को मजबूत कर रहा है। ली ने 15 अगस्त को उत्तर कोरिया के साथ बातचीत फिर शुरू करने की अपील की थी, लेकिन प्योंगयांग ने अब तक इसका सकारात्मक जवाब नहीं दिया है।

 

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