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दुनिया

समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कोलकाता और मुंबई के लाखों लोग हो सकते हैं प्रभावित: यूएन

Updated on Tuesday, September 01, 2026 17:15 PM IST

संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कोलकाता और मुंबई में रह रहे लाखों लोग बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।

सोमवार को जारी रिपोर्ट में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ने के असर को लेकर कई गंभीर चेतावनियां दी गई हैं। ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर और बर्फ की परतें पिघलती हैं और पानी गर्म होता है, जिससे संपत्ति, लोगों और यहां तक कि संस्कृतियों पर भी असर पड़ता है।

पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स की 55वीं बैठक में सेक्रेटरी-जनरल अमीना मोहम्मद ने जो रिपोर्ट जारी की, उसके मुताबिक 2024 में समुद्र के जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है और यह लगभग छह मिलीमीटर दर्ज की गई है।

इस बैठक की मेजबानी पलाऊ कर रहा है, जो प्रशांत महासागर के द्वीपों का एक देश है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से इसके कई द्वीप काफी हद तक डूब सकते हैं। यह बैठक इसी गंभीर खतरे को उजागर कर रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा इलाकों और भारत के कोलकाता और मुंबई व बांग्लादेश के ढाका जैसे शहरों में सबसे बड़ा असर लोगों के विस्थापन के रूप में दिख रहा है। यहां 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घर हमेशा के लिए पानी में डूबने का खतरा है।"

रिपोर्ट में इस डरावनी स्थिति के होने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है।

न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में असिस्टेंट सेक्रेटरी-जनरल नाविद हनीफ ने कहा कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर एक चुनौती पेश करता है, क्योंकि उन इलाकों में लोग अपना तटीय इलाका खो रहे हैं। समुद्र के बढ़ते जलस्तर का असर सिर्फ तटीय इलाकों तक ही सीमित नहीं है।

उन्होंने कहा, "कृपया समुद्र के बढ़ते जलस्तर को एक बड़ी व्यवस्थागत समस्या के तौर पर देखें, क्योंकि इसका असर सेहत, खाद्य सुरक्षा, मानवाधिकारों और संस्कृति पर पड़ेगा। आप अपनी पुश्तैनी जमीन और अपनी पहचान खो देंगे। इसलिए सरकारों को इस मुद्दे को अपनी योजना बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाने के लिए बहुत व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।"

पिछले सप्ताह नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिमालय से ग्लेशियर के टूटने और नीचे गिरने से पानी और कीचड़ का सुनामी जैसा सैलाब आया, जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और कई इलाके बर्बाद हो गए।

दक्षिण एशिया पर ग्लेशियरों के पिघलने या नीचे गिरने के असर के बारे में पूछे जाने पर हनीफ ने कहा कि हिमालय के ग्लेशियरों को 'तीसरा ध्रुव' माना जाता है।

उन्होंने कहा, "हमारे पास उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव हैं और दक्षिण एशिया में दुनिया के ग्लेशियरों का बड़ा जमावड़ा होने के कारण इसे 'तीसरा ध्रुव' माना जाता है। अगले 15 से 20 सालों में दक्षिण एशिया के लिए ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़ का खतरा है। उन्होंने कहा कि इसके बाद सूखा पड़ सकता है, जिससे फसलें और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है और बड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में लगभग 77 करोड़ लोग, यानी धरती पर हर दस में से लगभग एक व्यक्ति खतरे में हैं, क्योंकि वे ऐसे तटीय इलाकों में रहते हैं, जो हाई-टाइड लाइन (ज्वार-भाटा के दौरान पानी के अधिकतम स्तर की रेखा) से पांच मीटर से भी कम ऊंचे हैं और पहले से ही बड़े खतरों का सामना कर रहे हैं।

अनुमान है कि दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से जुड़े खतरों के कारण कम से कम 1.8 ट्रिलियन डॉलर की कीमत वाले इंफ्रास्ट्रक्चर को खतरा है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "समुद्र का जलस्तर बढ़ने से पहले ही शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, जल प्रणालियों, परिवहन, ऊर्जा ग्रिड, इमारतों और भूजल संसाधनों को नुकसान पहुंच रहा है। इसके दूरगामी परिणाम हो रहे हैं, जो लंबे समय में मानवाधिकारों के प्रभावी उपभोग के लिए खतरा पैदा करते हैं।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि समुद्र का जलस्तर बढ़ने का खतरा सबसे अधिक द्वीपीय देशों को महसूस होगा, लेकिन यह खतरा भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता।

रिपोर्ट में कहा गया है, "उदाहरण के लिए, अमेरिका में मियामी और न्यूयॉर्क और चीन में ग्वांगझू जैसे अधिक आय वाले शहरों में मुख्य असर तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाला भारी वित्तीय जोखिम है, जिसमें खतरे में पड़ी संपत्तियों का अनुमानित मूल्य 2 ट्रिलियन डॉलर से 3.5 ट्रिलियन डॉलर के बीच है।"

 

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