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राष्ट्रीय

बालेंद्र शाह के दावे पर भारत की दो टूक, सीमा मामलों में तीसरे पक्ष की गुंजाइश नहीं

Updated on Tuesday, June 02, 2026 20:20 PM IST

नई दिल्ली : भारत ने मंगलवार को नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सीमा संबंधी टिप्पणियों पर कड़ा जवाब दिया और स्पष्ट किया कि भारत और नेपाल के बीच के मुद्दों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है। भारत ने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े सभी मामलों का समाधान द्विपक्षीय संवाद और स्थापित तंत्रों के माध्यम से किया जाएगा।

नई दिल्ली में मंगलवार को वीकली मीडिया ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत ने भारत-नेपाल बाउंड्री के मुद्दे पर बालेंद्र शाह की बातें सुनी हैं।

जायसवाल ने कहा, "हमने नेपाल के प्रधानमंत्री की भारत-नेपाल बाउंड्री के बारे में बातें और इस मामले पर नेपाली विदेश मंत्रालय का बाद में दिया गया बयान देखा है। हालांकि भारत-नेपाल बाउंड्री का लगभग 98 फीसदी हिस्सा तय हो चुका है, लेकिन कुछ हिस्से अभी अनसुलझे हैं। गंडक नदी का रास्ता बदलने की वजह से यह स्थिति बनी है।"

उन्होंने कहा, "सीमा के तय हिस्सों में नो मैन्स लैंड पर सीमा पार से कब्जे के मामले भी हैं, जिनकी अभी मिलकर मैपिंग की जा रही है। हमने सीमा से जुड़े मामलों के सभी पहलुओं से निपटने के लिए द्विपक्षीय सिस्टम बनाए हैं। सभी संबंधित लोगों को यह साफ होना चाहिए कि भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय मामले में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।"

विदेश मंत्रालय का यह जवाब बालेंद्र शाह द्वारा रविवार को किए उस दावे के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि नेपाल ने भारतीय इलाके पर कब्जा किया है। हालांकि बालेंद्र शाह ने यह जानकारी नहीं दी कि नेपाल ने भारतीय जमीन पर कब्जा कहां किया है।

पीएम शाह स्थानीय सांसदों को जवाब दे रहे थे, जिन्होंने उनसे लिम्पियाधुरा, लिपुलेक और कालापानी के विवादित इलाके में भारत के कथित कब्जे के बारे में सवाल किया था। नेपाल और भारत दोनों ही इन इलाकों पर अपना हक जताते हैं, हालांकि यह इलाका असल में दशकों से भारत के नियंत्रण में है।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि भारत ने न सिर्फ नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है। दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को देखना चाहिए।"

शाह ने यह भी कहा कि नेपाल ने भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर चीन और ब्रिटेन के साथ डिप्लोमैटिक बातचीत की है। शायद यह पहली बार था जब नेपाल ने खुले तौर पर माना कि वह नेपाल-भारत बॉर्डर विवाद को लेकर ब्रिटेन के साथ बातचीत कर रहा है।

बालेंद्र शाह ने कहा, "हमने न सिर्फ भारत और चीन से बल्कि ब्रिटेन सरकार से भी बात की है। हमारा मानना है कि ब्रिटेन को भी इसमें दिलचस्पी लेनी चाहिए, क्योंकि यह मामला उस समय का है, जब भारत पर अंग्रेजों का कंट्रोल था।"

हालांकि, प्रधानमंत्री शाह की ओर से दिए गए इस बयान के बाद नेपाल के विपक्षी दलों, विदेशी मामलों के जानकारों और सीमा विश्लेषकों ने इसकी कड़ी आलोचना की। उनका कहना था कि इन बातों से भारत के साथ सीमा विवाद पर नेपाल की लंबे समय से चली आ रही स्थिति कमजोर हुई है और सीमा के मुद्दों पर भारत के साथ भविष्य की बातचीत में नेपाल का रुख कमजोर हुआ है।

नेपाली सरकार ने रविवार को एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री की बातें सीमाई इलाकों में की गई तकनीकी अध्ययन से जुड़ी थीं, जहां एक देश के नागरिक ऐसी जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं या उस पर कब्जा कर रहे हैं जो तकनीकी तौर पर दूसरे देश के इलाके में आती है। प्रधानमंत्री ने संसद में जिस मामले का जिक्र किया, वह मुख्य रूप से नो-मैन्स लैंड क्षेत्र में अतिक्रमण और बॉर्डर पार कब्जे से जुड़ा था।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि नदी सीमा वाले इलाकों में अपनाए गए "फिक्स्ड बाउंड्री प्रिंसिपल" की वजह से, कुछ जगहों पर ऐसे हालात बन गए हैं जहां नेपाली नागरिक टेक्निकली भारत की तरफ की जमीन पर खेती करते हैं या रहते हैं, जबकि भारतीय नागरिक नेपाल के इलाके में आने वाली जमीन का इस्तेमाल करते हैं।

नेपाल और भारत के बीच एक लंबा और खुला बॉर्डर है, जिसका ज्यादातर हिस्सा 1816 की सुगौली संधि से तय हुआ था। हालांकि सुस्ता और लिम्पियाधुरा-लिपुलेख-कालापानी जैसे इलाकों में मैपिंग अभी अधूरी है।

मंगलवार को नई दिल्ली में मीडिया ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने नेपाल की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के चीफ रबी लामिछाने के चल रहे भारत दौरे के बारे में भी बात की।

उन्होंने कहा, दोनों देशों के लोगों के बीच करीबी संबंध हैं और दोनों तरफ की पॉलिटिकल पार्टियों के बीच भी संबंध हैं और ये संपर्क जारी हैं।"

 

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