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लेख

डॉ. सौरभ गर्ग और डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन | विकास के आंकड़ों की जांच-परख

Updated on Monday, September 07, 2026 17:32 PM IST

 

(चंडीगढ़) अभिषेक आनंद, जोश फेल्मन और अरविंद सुब्रमण्यन ने यह पूछा है कि जिस तिमाही में ऊर्जा के क्षेत्र में जोरदार झटके लगे हों, उसमें भारत की विकास दर आखिर 7.8 प्रतिशत कैसे हो सकती है। बेशक, यह एक उचित सवाल है। इसका एक जवाब भी है और वह जवाब पिछले कुछ वर्षों से सबके सामने ही है। समय से ही शुरुआत करते हैं। इस तिमाही की अवधि अप्रैल से जून 2026 तक थी। इससे ठीक पहले ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इजराइल के बीच का संघर्ष चरम पर पहुंच गया था। तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया और भारत ने इसका असर महसूस किया। हालांकि मार्च और अप्रैल के शुरुआती दिनों में इस जबरदस्त व्यवधान में कमी आई। मई आते-आते दबाव के बदल छंट गए। जून तक, मुश्किल दौर बीत चुका था। तीन महीने वाली तिमाही की शुरुआत के कुछ मुश्किल हफ्ते उस तिमाही के आंकड़ों को मनगढ़ंत नहीं बना देते। उन महीनों के सबूत एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। ऑटोमोबाइल की बिक्री में निरंतर बढ़ोतरी हुई। एक प्रतिस्पर्धी मुद्रा की मदद से बैंक ऋण और निर्यात में बढ़ोतरी हुई। जीएसटी की दरों में कटौती के बावजूद, इसका संग्रह मजबूत बना रहा और हाल ही समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में इसमें 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2025-26 तक के तीन वर्षों में, जीएसटी के सकल संग्रह में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ‘नॉमिनल जीडीपी’ में 31.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये दोनों आंकड़े बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं और दोनों ही लगभग एक-दूसरे से मेल खाते हैं। जीएसटी रिटर्न कंपनियां दाखिल करती हैं। ऋण संबंधी आंकड़े बैंकों से आते हैं। व्यापार के आंकड़े  बंदरगाहों से आते हैं। इनमें से कोई भी आंकड़ा सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा तैयार नहीं किया जाता है।

अर्थव्यवस्था आखिर टिकी क्यों रही? क्योंकि कई सुधारों को एक साथ अपनाया गया। वर्ष 2022-23 के बाद से केन्द्र सरकार का पूंजीगत व्यय 65 प्रतिशत बढ़ा है और इस वर्ष इसमें 11.5 प्रतिशत और बढ़ोतरी का बजट रखा गया है। एक दशक में बनाई गई सड़कें, बंदरगाहें और बिजली संयंत्र तेल के महंगे होने पर ठप्प नहीं पड़े। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने अनौपचारिक गतिविधियों के एक बड़े हिस्से को औपचारिक बनाया और उन्हें मापी जा सकने वाली अर्थव्यवस्था में शामिल किया है। दिवाला संहिता ने डूबे हुए कर्ज (बैड डेट) से निपटने के बैंकों और कंपनियों के तौर-तरीकों को बदल दिया। रियल एस्टेट कानून ने उस सेक्टर को साफ-सुथरा बनाया, जो कभी अटकी हुई परियोजनाओं और पैसे के अपारदर्शी लेन-देन के लिए जाना जाता था। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 2023 में उस सफाई अभियान का उल्लेख किया था। उसने नई दिल्ली पर कोई मेहरबानी नहीं की थी। इसके बाद, तेल की कीमतों में अचानक आए उछाल से निपटने के लिए सरकार ने जो कुछ किया, वह भी सामने है। उसने कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ आम परिवारों और कंपनियों पर नहीं डाला। उसने इसकी लागत खुद वहन की। राजकोषीय गुंजाइश (फिस्कल स्पेस) का उद्देश्य ही यही है और भारत ने इसे तैयार किया है। इसका सबूत 2 सितंबर को मिला। जापान की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दिया और इसके साथ ही स्थिर संभावना भी जताई। इसके अलावा, देश की रेटिंग सीमा (कंट्री सीलिंग) को भी ए कर दिया। भारत को तीन दशकों से अधिक समय से ‘ए’ रेटिंग नहीं मिली है। एजेंसी ने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, जीएसटी, दिवाला संहिता और सकल गैर-निष्पादित ऋण अनुपात (ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग लोन रेश्यो) के 1.8 प्रतिशत तक कम होने का उल्लेख किया। उसने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार ने उच्च पूंजीगत व्यय को जारी रखते हुए भी अपने राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2025 में जीडीपी  के 4.7 प्रतिशत से घटाकर वित्तीय 2026 में 4.4 प्रतिशत कर लिया। टोक्यो स्थित एक रेटिंग समिति के लिए दिल्ली में किसी को खुश करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने भी उन्हीं सुधारों को देखा और वही नतीजा निकाला।

अब आलोचना के मुख्य बिंदु पर आते हैं। लेखकगण पूछते हैं कि अगर आज ये संकेतक 7.8 प्रतिशत की विकास दर को सही ठहराते हैं, तो पूर्व के वर्षों में वैसी ही विकास दर कमजोर संकेतकों के साथ क्यों संभव हुई थी? यह मान लेना कि विकास हमेशा एक जैसी चीजों से ही संभव होती है, जरूरी नहीं है। निर्यात और औपचारिक ऋण से प्रेरित तिमाही, घरेलू खर्च या सरकारी निवेश से चलने वाले वर्ष जैसी नहीं होगी। पूर्व के वर्षों में विकास के अपने कारण थे, जो उस समय साफ दिख रहे थे। वर्ष 2024-25 तक, शेयर बाजार तेजी से चढ़ा और अधिक संख्या में भारतीयों ने निवेश करना शुरू किया। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के बीच परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। गैर-बैंक और तकनीक-आधारित ऋणदाता तेजी से बढ़े। वाणिज्यिक क्षेत्र में कुल संसाधनों का प्रवाह तीन वर्षों में 72 प्रतिशत बढ़ा, जिसमें गैर-बैंकों की  हिस्सेदारी 96 प्रतिशत बढ़ी। ये असली कारण थे। बस, वे अलग थे।

वर्ष 2024-25 में, नई श्रृंखला के तहत नॉमिनल जीडीपी की विकास दर पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम रही - 9.8 प्रतिशत  के मुकाबले 9.4 प्रतिशत  - जबकि असल विकास बढ़ी। नॉमिनल जीडीपी  सरकार के राजकोषीय लक्ष्यों का आधार होती है। सरकार सबसे ज़्यादा इसी आंकड़े को ऊंचा रखना चाहती है। अगर कोई मंत्रालय आंकड़ों में हेरफेर करता है, तो वह ऐसा अपनी कीमत पर नहीं करता। वर्ष 2024-25 और 2025-26 को मिलाकर देखें, तो नई श्रृंखला के तहत औसत असल विकास दर 7.0 प्रतिशत से बढ़कर 7.5 प्रतिशत हो जाती है। यह आधा प्रतिशत अंक अधिक है। अगर तीन वर्षों - 2023-24 से 2025-26 - को लें, तो नई में औसत ग्रोथ पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम है - 7.7 प्रतिशत  के मुकाबले 7.4 प्रतिशत।

भारत ने एक बड़े झटके का सामना किया और आगे बढ़ता रहा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि उसने एक दशक में अपनी क्षमता बढ़ाई थी और वित्तीय मजबूती हासिल की थी। यह एक ठोस नतीजा है, न कि कोई बनावटी बात।

 

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