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लेख

एम. एल. जाट और नवीन पी. सिंह | संवाद से परिणाम तक: आसियान-भारत कृषि सहयोग के तीन दशकों को किसानों की समृद्धि में बदलना

Updated on Monday, September 07, 2026 17:37 PM IST

( चंडीगढ़ ) जब भारत और आसियान के 11 सदस्य देशों के अधिकारी और मंत्री नई दिल्ली में दो दिवसीय बैठक के लिए एकत्र हो रहे हैं, तो इस साझेदारी का वास्तविक सार किसी साझा विज्ञप्ति में नहीं, बल्कि 1992 से लगातार विकसित किए गए अनुसंधान, प्रशिक्षण और ज़मीनी स्तर के कार्यक्रमों में निहित है। नई दिल्ली में 9 सितंबर को आयोजित होने वाली कृषि एवं वानिकी पर 9वीं आसियान-भारत मंत्रिस्तरीय बैठक (AIMMAF) एक स्थापित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी: मंत्रियों के विचारार्थ तकनीकी सिफारिशों पर चर्चा और उन्हें अंतिम रूप देने के लिए कृषि एवं वानिकी पर 10वां आसियान-भारत कार्य समूह (AIWGAF) एक दिन पहले बैठक करेगा। हालांकि यह एक औपचारिक प्रक्रिया या 1992 में भारत-आसियान क्षेत्रीय संवाद शुरू होने के बाद से विकसित तंत्र का एक सामान्य दौर लग सकता है, लेकिन औपचारिकताओं से परे जाकर यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस संस्थागत साझेदारी ने तीन दशकों में क्या हासिल किया है। इसलिए, यह बैठक न केवल प्रगति की समीक्षा करने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि इस दीर्घकालिक सहयोग को पूरे क्षेत्र के किसानों की समृद्धि, आजीविका और खाद्य प्रणालियों के लिए अधिक ठोस परिणामों में बदलने का भी अवसर देती है।

साझा कृषि वास्तविकताएं, साझा अवसर

भारत और ग्यारह आसियान सदस्य देश—जिनमें अक्टूबर 2025 में शामिल हुआ नया सदस्य तिमोर-लेस्ते भी शामिल है, अपार कृषि विविधता और विकास क्षमता वाले क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। आसियान के कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन क्षेत्र लगभग 93 मिलियन नौकरियों को सहारा देते हैं, जबकि भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्र लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल को रोज़गार प्रदान करते हैं।दोनों ही क्षेत्रों में खेत मुख्य रूप से छोटे और खंडित हैं, उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है, तथा दोनों क्षेत्रों में एक जैसी फसलें और ईकोसिस्टम सीमाओं के पार फैले हुए हैं। इनमें धान, दालें, फल और मसालों से लेकर पशुधन, मत्स्पालन, मैंग्रोव और वन तक शामिल हैं। दोनों क्षेत्र जलवायु परिवर्तनशीलता, सीमा पार से आने वाले कीट-रोगों और कटाई के बाद होने वाले निरंतर नुकसान के बढ़ते दबाव का भी सामना कर रहे हैं।यह समानताएं कृषि ज्ञान और प्रौद्योगिकियों को परस्पर साझा करने के लिए बेहद अनुकूल बनाती हैं, जिससे 'भारत-आसियान मध्यम अवधि कार्य योजना 2026–2030' के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है। यह योजना आसियान की नई 'खाद्य, कृषि और वानिकी क्षेत्रीय योजना 2026–2030' और इसके छह रणनीतिक स्तंभों-स्थिरता, डीकार्बोनाइजेशन, खाद्य सुरक्षा, व्यापार कनेक्टिविटी, डिजिटल नवाचार और सतत वन प्रबंधन-के अनुरूप है।

भारत का कृषि ज्ञान और तकनीकी आधार

इस साझेदारी में भारत का योगदान दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वित्तपोषित कृषि अनुसंधान और विस्तार प्रणालियों में से एक पर आधारित है। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत 114 अनुसंधान संस्थान तथा ब्यूरो, 80 कृषि विश्वविद्यालय और 731 जिला-स्तरीय विस्तार केंद्र (कृषि विज्ञान केंद्र) शामिल हैं। पिछले 12 वर्षों में इस नेटवर्क ने फसलों की 3,800 से अधिक किस्में जारी की हैं, जिनमें से लगभग 3,100 विशेष रूप से जलवायु अनुकूलता के लिए और लगभग 200 बेहतर पोषण गुणों के साथ विकसित की गई हैं। इसे एक राष्ट्रीय जीन बैंक का भी समर्थन प्राप्त है, जिसमें करीब 4,70,000 प्रविष्टियां (accessions) संरक्षित हैं। भारत के कृषि रूपांतरण का पैमाना उसके उत्पादन में हुई वृद्धि में दिखता है। खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के लगभग 25.2 करोड़ टन से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 37.7 करोड़ टन हो गया है, जबकि इसी अवधि में दूध उत्पादन करीब 14.6 करोड़ टन से बढ़कर लगभग 24.8 करोड़ टन तक पहुंच गया है। मत्स्पालन में, उत्पादन पिछले दशक में लगभग दोगुना होकर करीब 2 करोड़ टन हो गया है, जो अनुमानित 3 करोड़ आजीविकाओं को सहारा दे रहा है; साथ ही 49 फिनफिश और शेलफिश प्रजातियों के लिए कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की गई हैं। यही वह विशेषज्ञता है जिसे भारत इस साझेदारी में लाता है-किसी श्रेष्ठता के दावे के रूप में नहीं, बल्कि उन कृषि-पारिस्थितिक स्थितियों द्वारा गढ़े गए एक ठोस संसाधन आधार के रूप में, जो दक्षिण पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों से काफी मेल खाते हैं।

व्यावहारिक धरातल पर क्या है यह सहयोग

अनुसंधान अवसंरचना से परे, इस साझेदारी का अधिक ठोस योगदान मानव पूंजी के निर्माण और ज़मीनी स्तर के विस्तार को मजबूत करने में रहा है। आसियान-भारत फैलोशिप कार्यक्रम सदस्य देशों के छात्रों को प्रमुख भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जिससे वे क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के रूप में पहचाने गए क्षेत्रों में अनुसंधान और विशेषज्ञता से परिचित होते हैं। भारत की अपनी विस्तार पहल भी यह दर्शाती हैं कि इस तरह के सहयोग को किस बड़े पैमाने पर व्यवहार में लाया जा सकता है। विकसित कृषि संकल्प अभियान 13.5 लाख से अधिक किसानों तक पहुंचा और अनुसंधान एवं नीतिगत ध्यान के लिए 500 से अधिक प्राथमिकता वाले मुद्दों की पहचान की। एक संबंधित आउटरीच पहल ने 728 जिलों में 1,34,000 से अधिक कार्यक्रम चलाए, 6,650 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए और 1,00,000 से अधिक फील्ड प्रदर्शन किए, जबकि इसका डिजिटल प्रसार लगभग 5 करोड़ हितधारकों तक पहुंचा। ये घरेलू अनुभव आसियान के लिए केवल अपने बड़े पैमाने के कारण ही प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी हैं क्योंकि ये अपेक्षाकृत कम लागत वाले और व्यापक पहुंच वाले विस्तार मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें इस क्षेत्र के छोटे किसानों की कृषि प्रणालियों के अनुसार ढाला जा सकता है। अवसर इस बात में है कि मंत्रालयों और शोध संस्थानों के बीच केवल औपचारिक आदान-प्रदान से आगे बढ़कर ऐसे तंत्र बनाए जाएं जो ज्ञान, तकनीक और प्रशिक्षण को सीधे किसानों से जोड़ें-और यह केवल व्यापार उपकरणों के बजाय संस्थागत सहयोग के माध्यम से हो।

 

साझेदारी का आकलन घोषणाओं से नहीं, परिणामों से हो

इसलिए 9वीं AIMMAF का मूल्यांकन उसके संयुक्त बयान की भाषा से नहीं, बल्कि बैठक के बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। वास्तविक और कड़ी परीक्षा-विशेषकर भारत और आसियान में कृषि के विशाल पैमाने को देखते हुए-यह है कि क्या यह सहयोग 2026–2030 की कार्य योजना के दौरान मापने योग्य परिणाम देता है या नहीं।इसका अर्थ कुछ ठोस प्रश्न पूछना है: आसियान की परिस्थितियों में भारत की कितनी फसल किस्मों का परीक्षण और उन्हें अपनाया गया? आसियान फैलोशिप से निकले कितने छात्र अपने राष्ट्रीय कृषि तंत्र को मजबूत करने के लिए वापस लौटे? क्या संयुक्त कीट-निगरानी और कटाई उपरांत प्रोटोकॉल सहमत रूपरेखाओं से आगे बढ़कर नियमित व्यवहार में आए? और क्या भारत के सिद्ध विस्तार मॉडलों को आसियान के छोटे किसानों की अर्थव्यवस्था के अनुसार सार्थक रूप से ढाला गया?ये परिणाम इस सप्ताह नई दिल्ली में तुरंत दिखाई नहीं देंगे। ये समय के साथ खेतों, प्रयोगशालाओं, संस्थानों और अंततः 10वीं AIMMAF में प्रस्तुत साक्ष्यों में उभरेंगे। वहीं इस साझेदारी की वास्तविक सफलता का आकलन किया जाना चाहिए: भारत और आसियान भर के किसानों और ग्रामीण समुदायों की आजीविका, लचीलेपन, उत्पादकता और आय में।

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